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हिमालयी सुरक्षा के लिए मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए केंद्र सरकार प्रतिबद्ध – सांसद त्रिवेन्द्र सिंह रावत

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  • उत्तराखंड में स्वचालित मौसम स्टेशनों की संख्या बढ़ाकर 31 की
  • लैंसडाउन में नए एक्स-बैंड डॉप्लर वेदर रडार की स्थापना के साथ राज्य में कुल तीन डॉप्लर रडार संचालित

देहरादून/ नई दिल्ली : लोकसभा में हरिद्वार सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखंड त्रिवेन्द्र सिंह रावत द्वारा हिमालयी राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड में बाढ़, भूस्खलन तथा ग्लेशियर पिघलने से उत्पन्न आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली के संबंध में पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में पृथ्वी विज्ञान एवं विज्ञान-प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने अपने उत्तर में अवगत कराया कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा एक समग्र बहु-जोखिम पूर्व चेतावनी प्रणाली (Multi-Hazard Early Warning System) विकसित की गई है, जिसमें प्रेक्षण नेटवर्क, उन्नत पूर्वानुमान मॉडल तथा जीआईएस आधारित निर्णय समर्थन प्रणाली सम्मिलित है। यह प्रणाली चक्रवात, भारी वर्षा सहित विभिन्न मौसम संबंधी खतरों की समयपूर्व पहचान एवं प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करती है तथा आधुनिक दूरसंचार माध्यमों के जरिए सूचनाओं का त्वरित प्रसार संभव बनाती है। उन्होंने बताया कि जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत केन्द्रीय जल आयोग(Central Water Commission) द्वारा हिमालयी राज्यों में अल्पकालिक बाढ़ पूर्वानुमान जारी किए जाते हैं, जिनमें 24 घंटे तक का लीड टाइम उपलब्ध रहता है। इसके साथ ही बाढ निगरानी 2.0 सी- फ्लड ( “FloodWatch India 2.0” एवं “C-FLOOD”) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा अन्य संचार माध्यमों के जरिए ग्राम स्तर तक बाढ़ संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। दक्षिण एशिया फ्लैश फ्लड गाइडेंस सिस्टम के माध्यम से 6 से 24 घंटे पूर्व फ्लैश फ्लड की चेतावनी भी दी जा रही है।

भूस्खलन की घटनाओं के संदर्भ में मंत्री ने कहा कि भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) द्वारा उत्तराखंड सहित विभिन्न हिमालयी राज्यों में मानसून अवधि के दौरान दैनिक भूस्खलन पूर्वानुमान बुलेटिन जारी किए जाते हैं, जिनमें आगामी 48 घंटे तक की संभावनाओं का आकलन किया जाता है।

उत्तराखंड राज्य में मौसम संबंधी अवसंरचना को सुदृढ़ करने के लिए पिछले तीन वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की गई है। लैंसडाउन में नए एक्स-बैंड डॉप्लर वेदर रडार की स्थापना के साथ राज्य में अब कुल तीन डॉप्लर रडार संचालित हैं। इसके अतिरिक्त स्वचालित मौसम स्टेशनों की संख्या बढ़ाकर 31 की गई है तथा वर्षा मापन के लिए स्वचालित वर्षामापक और निगरानी स्टेशनों का विस्तार किया गया है। केदारनाथ में उच्च-ऊंचाई स्वचालित मौसम प्रेक्षण प्रणाली की स्थापना से दुर्गम क्षेत्रों में भी मौसम निगरानी सुदृढ़ हुई है।

ग्लेशियरों की निगरानी के संबंध में मंत्री ने जानकारी दी कि इसरो (Indian Space Research Organisation) द्वारा उपग्रह आधारित रिमोट सेंसिंग एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली तकनीकों का उपयोग कर हिमालयी ग्लेशियरों के आकार, विस्तार एवं गतिशीलता की नियमित निगरानी की जा रही है। इस प्रक्रिया से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसे जोखिमों का आकलन करने तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में सहायता मिल रही है।

आपदा प्रबंधन को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से आईएमडी ( भारत मौसम विभाग) द्वारा राज्यों को सात दिनों तक के वर्षा पूर्वानुमान, उच्च-रिजोल्यूशन मौसम आंकड़े, कृषि मौसम परामर्श सेवाएं तथा बिजली, भारी वर्षा और अन्य चरम मौसम घटनाओं के संबंध में समय-समय पर अलर्ट उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त जिला स्तरीय जलवायु जोखिम एवं सुभेद्यता एटलस भी तैयार किए गए हैं, जिनका उपयोग राज्य सरकारें आपदा जोखिम न्यूनीकरण और योजना निर्माण में कर रही हैं।

सांसद रावत ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है और यहां पूर्व चेतावनी प्रणालियों का सुदृढ़ होना जनजीवन की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इन व्यवस्थाओं का प्रभावी क्रियान्वयन ग्राम स्तर तक सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जिससे स्थानीय समुदाय समय रहते सतर्क हो सके और आपदा जोखिम को न्यूनतम किया जा सके।

सांसद रावत ने इस विषय पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के लिए पृथ्वी विज्ञान एवं विज्ञान-प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए ये कदम हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे।